#SchoolSafety: नौनिहालों की सुरक्षा पर ‘जीरो टॉलरेंस’—देहरादून के 79 जर्जर स्कूल भवन होंगे ध्वस्त; DM सविन बंसल का बड़ा एक्शन
मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन की सख्त कार्रवाई: महज 10 दिन में तैयार हुई 100 स्कूलों की रिपोर्ट। ₹1 करोड़ की राशि स्वीकृत; जर्जर भवनों की जगह अब सुरक्षित माहौल में होगी पढ़ाई।
मासूमों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं
देहरादून (19 जनवरी 2026): देहरादून जनपद के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए आज का दिन एक बड़ी राहत लेकर आया है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने मुख्यमंत्री के सख्त विजन को धरातल पर उतारते हुए जिले के 79 अत्यंत जर्जर और निष्प्रोज्य (Unusable) स्कूल भवनों को तत्काल ध्वस्त करने और वहां वैकल्पिक शिक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
1. रफ्तार और जवाबदेही: 10 दिन में ‘आर-पार’ की कार्रवाई
प्रशासन की सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिपोर्ट में देरी करने वाले अधिकारियों को कड़ी चेतावनी मिलने के महज 10 दिनों के भीतर शिक्षा विभाग ने 100 संदिग्ध स्कूलों की विस्तृत जांच रिपोर्ट टेबल पर रख दी। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जब बात बच्चों की जान की हो, तो लालफीताशाही (Red Tape) के लिए कोई जगह नहीं है।
2. आंकड़ों की नज़र में: कहाँ और कितने स्कूल?
जांच में पाया गया कि जनपद के कई स्कूल भवन अब इस स्थिति में नहीं हैं कि वहां एक भी दिन कक्षाएं चलाई जा सकें।
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पूर्णतः निष्प्रोज्य भवन: कुल 79 विद्यालय (इनमें 66 प्राथमिक और 13 माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं)।
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आंशिक निष्प्रोज्य: 17 विद्यालय (जहाँ मरम्मत या कुछ कमरों को प्रतिबंधित किया जाएगा)।
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सुरक्षित: केवल 8 विद्यालयों के भवन पूरी तरह दुरुस्त पाए गए।
3. बजट और एक्शन प्लान: ₹1 करोड़ की तत्काल मंजूरी
ध्वस्तीकरण और मलबे के निस्तारण में फंड की कमी आड़े न आए, इसके लिए जिलाधिकारी ने ₹1 करोड़ की धनराशि तुरंत स्वीकृत कर दी है। लोक निर्माण विभाग (PWD) को इन भवनों के सुरक्षित ध्वस्तीकरण का जिम्मा सौंपा गया है, ताकि आसपास के क्षेत्र को कोई खतरा न हो।
4. बच्चों की पढ़ाई का क्या? (वैकल्पिक व्यवस्था)
प्रशासन ने सुनिश्चित किया है कि भवन टूटने से बच्चों की शिक्षा बाधित न हो:
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63 विद्यालयों में वैकल्पिक कक्षाएं पहले ही शिफ्ट कर दी गई हैं।
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16 शेष विद्यालयों के लिए डीएम ने तत्काल शिफ्टिंग के आदेश दिए हैं।
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सख्त हिदायत: किसी भी हाल में जर्जर भवनों के भीतर या उनके निकट बच्चों को नहीं बैठने दिया जाएगा।
“बच्चों की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी जोखिमपूर्ण भवन में शिक्षण कार्य संचालित करना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह मासूमों के जीवन से खिलवाड़ है। हम समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से इन खतरनाक ढांचों को हटाकर सुरक्षित बुनियादी ढांचा तैयार करेंगे।” — सविन बंसल, जिलाधिकारी, देहरादून
निष्कर्ष: सुशासन का मानवीय चेहरा
यह कार्रवाई केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि उन अभिभावकों के लिए एक भरोसा है जो अपने बच्चों को भारी मन से जर्जर स्कूलों में भेजते थे। देहरादून जिला प्रशासन का यह कदम प्रदेश के अन्य जनपदों के लिए भी एक मिसाल पेश करता है कि कैसे इच्छाशक्ति हो तो ‘जीरो टॉलरेंस’ को हकीकत में बदला जा सकता है।

