Friday, August 7, 2026
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हथकरघा दिवस पर नाबार्ड की अनूठी पहल: मुंबई में सजी देश की 15 प्रसिद्ध हथकरघा धरोहरों की भव्य प्रदर्शनी

पैठणी, पोचमपल्ली से लेकर भागलपुरी सिल्क तक एक ही छत के नीचे; ‘बायर-सेलर मीट’ से बुनकरों को सीधे बाजार से जोड़ने की तैयारी

मुंबई/देहरादून। भारत की समृद्ध हथकरघा (Handloom) विरासत के संरक्षण और पारंपरिक बुनकर समुदायों की आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) ने एक बड़ा कदम उठाया है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (7 अगस्त) के पावन अवसर पर नाबार्ड द्वारा मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) स्थित अपने प्रधान कार्यालय में 5 से 7 अगस्त 2026 तक तीन दिवसीय भव्य प्रदर्शनी-सह-बिक्री (Exhibition-cum-Sale) का आयोजन किया जा रहा है।

इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य देश के कोने-कोने में छिपे बुनकरों और कारीगरों की कला को पहचान देना और उन्हें सीधे ग्राहकों व खरीदारों से जोड़ना है।

देशभर की 15 विशिष्ट हथकरघा परंपराओं का संगम

इस प्रदर्शनी में भारत के सांस्कृतिक विविधता और बुनाई कला को दर्शाती 15 प्रमुख पारंपरिक हथकरघा शैलियों के उत्पाद प्रदर्शित और बेचे जा रहे हैं:

  • मध्य व पश्चिम भारत: महाराष्ट्र की प्रसिद्ध ‘पैठणी’, राजस्थान की ‘कोटा डोरिया’, गुजरात के ‘कच्छ शॉल’ और मध्य प्रदेश का ‘बाघ प्रिंट’।

  • दक्षिण भारत: तेलंगाना की ‘पोचमपल्ली इकट’, आंध्र प्रदेश की ‘वेंकटगिरि’, तमिलनाडु की ‘अरनी सिल्क’, केरल की ‘बलरामपुरम’ और कर्नाटक की ‘उत्तरिया’।

  • उत्तर व पूर्वी भारत: उत्तर प्रदेश की ‘मुबारकपुर’, बिहार की ‘भागलपुर सिल्क’, पश्चिम बंगाल की ‘कांथा स्टिच’, ओडिशा की ‘संबलपुरी’, झारखंड की ‘भगैया सिल्क’ और हरियाणा का ‘अंबाला हैंडलूम’।

कारीगरों के लिए ‘बायर-सेलर मीट’ का आयोजन

केवल बिक्री ही नहीं, बल्कि बुनकरों के आर्थिक सुदृढ़ीकरण के लिए नाबार्ड ने विशेष ‘खरीदार-विक्रेता बैठक’ (Buyer-Seller Meet) का भी आयोजन किया है।

  • इसका उद्देश्य हस्तशिल्प समूहों, कारीगरों, कॉर्पोरेट खरीदारों और बाजार से जुड़े हितधारकों के बीच सीधा संवाद कायम करना है।

  • इससे ग्रामीण कारीगरों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और उनके लिए दीर्घकालिक व्यावसायिक अवसरों और सीधे बाजार संपर्कों का सृजन होगा।

जीआई टैगिंग (GI Tagging) और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

नाबार्ड केवल मेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक उत्पादों के भौगोलिक संकेतक (GI Registration), कौशल उन्नयन और ग्रामीण उद्यम उत्पादक संगठनों (OFPO) के माध्यम से बुनकर कारीगरों को संगठित कर रहा है।

“राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 1905 के ऐतिहासिक स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है। यह दिन हमारे बुनकरों द्वारा देश की सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में दिए गए अतुलनीय योगदान को सलाम करने का अवसर है।”नाबार्ड प्रबंधन

क्यों खास है यह पहल?

आधुनिक दौर में मशीनी कपड़ों के बढ़ते चलन के बीच हथकरघा उद्योग को बचाए रखना एक चुनौती है। नाबार्ड जैसी शीर्ष संस्था द्वारा संस्थागत स्तर पर बायर-सेलर मीट और प्रदर्शनी का आयोजन न केवल भारत की सांस्कृतिक जड़ों को सहेजता है, बल्कि लाखों ग्रामीण बुनकर परिवारों के जीवन में आर्थिक स्थिरता और स्वाभिमान का रंग भी भरता है।